लखनऊ अखिल भारतीय साहित्य परिषद लखनऊ की दक्षिण इकाई के द्वारा
‘संघ साहित्य : समग्र चिंतन प्रवाह’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ । जाह्नवी अवस्थी के संचालन मे वक्ताओं ने अपने विचार प्रस्तुत किये। वक्ताओं ने कहा कि संघ साहित्य कैसे राष्ट्र निर्माण, राष्ट्र विकास तथा राष्ट्र चिंतन को अपने साहित्य मे प्रभावी भूमिका रखता है। कैसे संघ साहित्य देश हित को समाहित कर समाज एवं देश में जागरूकता उत्पन्न करने का कार्य कर रहा है।
डॉ. मेधा अग्रवाल द्वारा वीणापाणि माँ शारदे की वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। स्निग्धा मिश्रा ने गीत ‘भारती की लोकमंगल साधना साकार हो’ की सुरमयी प्रस्तुति दी।
तत्पश्चात डॉ. कुमुद पांडे ने अपने वक्तव्य में डॉ. भीमराव अंबेडकर के सामाजिक चिंतन तथा ज्योतिबा फुले एवं सावित्रीबाई फुले के सामाजिक समता संबंधी प्रयासों का स्मरण कराते हुए कहा कि स्त्री की भूमिका केवल परिवार संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में भी उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
ज्योति किरन रतन ने अपने वक्तव्य मे कहा कि संघ साहित्य प्रेरणा का विषय है। इसका साहित्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का सराहनीय प्रयास है, जो भारत के विविध क्षेत्रों को एकता के सूत्र में बाँधता है। उन्होंने क्षेत्रीय साहित्य एवं भाषाओं से जुड़ने तथा रामचरितमानस जैसी कालजयी कृतियों के अनुसरण पर बल दिया।
छात्रा मुस्कान सिंह ने संघ साहित्य की अवधारणा, उसकी स्थापना तथा उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने संघ के लोकप्रिय गीत “मन मस्त फकीरी धारी है, अब एक ही धुन जय-जय भारत” का उल्लेख करते हुए संघ के राष्ट्रोन्मुख उद्देश्य को रेखांकित किया।
अंजली मिश्रा ने कहा कि साहित्य के माध्यम से जो शुभ, सत्य और सुंदर है, उसे प्रकाश में लाना चाहिए और संघ साहित्य यही कार्य करता है। यह न केवल व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करता है, बल्कि उसे समाज के यथार्थ से भी जोड़ता है तथा उसकी सामाजिक संवेदनशीलता को जागृत कर उसे स्वार्थ की सीमाओं से बाहर लाता है।परिषद इकाई अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ नीतू शर्मा ने कहा कि हम सब संघ का शताब्दी वर्ष मे महापुरुषों द्वारा रचित साहित्य हमारी युवा पीढ़ी के लिए अमूल्य धरोहर है, जो हमें दिशा और मार्गदर्शन प्रदान करता है। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों तथा उनकी कृति राष्ट्र चिंतन का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके सिद्धांतों को जीवन में उतारना आवश्यक है। उन्होंने अंत्योदय की अवधारणा का स्मरण कराते हुए कहा कि जब तक समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति का विकास नहीं होगा, तब तक राष्ट्र का समग्र विकास संभव नहीं है।
अंत में डॉ. कुमुद पांडे ने सभी वक्ताओं व श्रोताओं को धन्यवाद देकर कार्यक्रम का समापन किया।कार्यक्रम में स्नेहा सिंह, दीपशिखा राय, कुसुम लता, मीशा रतन ईशा रतन तथा राजवीर रतन उपस्थित रहे।

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