पद्मविभूषण महाराज को समर्पित बसंत उल्लास 26 मनाया ।

“दगा दै गयो वारी ।
चूडी चल गयी वलम वही पार दगा दै गया मार , सैया सलाम करत सासू हम ठीग ढाडी किवाडी ,तब लै निकस गये दूवारी ,दौडी जाये कै ताकी अटारी ,पड गयी दीदी पीठ कै ऊपर मोरी आसूवन भीगी सारी” डा विद्या बिन्दु के लोकगीत पर रेनू शर्मा ने भाव नृत्य किया। डा करूणा पाण्डे ने कहा ये जो परदे के तकाजो की बात करते हो हमने परदे मे हया देखी है। देवालयो मे कथा से प्रारम्भ होकर दरबारो मे श्रृंगार के साथ सामने आया।
पद्मविभूषण पं बिरजू महाराज के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में साँस्कृतिक साहित्यिक संस्था अल्पिका एवं कालका बिंदादीन महाराज की ड्योढ़ी व कथक संग्रहालय, लखनऊ के संयुक्त तत्त्वधान में आयोजित वसंत-उल्लास ’26 के आयोजन किया गया।
कथक और भारतीय संस्कृति ~ संस्कृतिक उत्थान में पं बिरजू महाराज का योगदान ~ विकसित भारत 2047 के संदर्भ में कथक विषयक संगोष्ठी मे बोलते हुए पद्मश्री डाॅ विद्या विंदु सिंह ने कहा की लोक से शास्त्र ने लेकर इला और मनु ने रसमय संगीत की सर्जना की। जो आज हम सभी कथक मे देख रहे।

दगा दै गयो वारी ।
चूडी चल गयी वलम वही पार दगा दै गया मार , सैया सलाम करत सासू हम ठीग ढाडी किवाडी ,तब लै निकस गये दूवारी ,दौडी जाये कै ताकी अटारी ,पड गयी दीदी पीठ कै ऊपर मोरी आसूवन भीगी सारी” डा विद्या बिन्दु के लोकगीत पर अल्पिका संस्था की सचिव और कथक नृतयांगना रेनू शर्मा ने भाव नृत्य किया। डा करूणा पाण्डे ने कहा ये जो परदे के तकाजो की बात करते हो हमने परदे मे हया देखी है। देवालयो मे कथा से प्रारम्भ होकर दरबारो मे श्रृंगार के रूप मे सबके सामने आया।
कथक मे पीढी दर पीढी मिलनै वाली धरोहर है जो गुरूओ से शिष्यो को प्राप्त होती है।
कथक प्रस्तुतिकरण मे वैभवी मिश्रा ने श्री कृष्ण निर्मित थुंगा थुंगा ,रुनझुन सिंह ने धमार मे प्रन और टुकडे प्रस्तुत किये ।।हर्षिता मिश्रा ने सांवरा गिरधर हमारो गीत पर कथक किया।
कल्चरल क्वेश्ट की गुरू सुरभि सिंह की शिष्यायो ईशा रतन, मीशा रतन , आकांक्षा पाणडे ने गणेश वंदना , उपज , पारम्परिक तीन ताल मे कथक प्रस्तुतीकरण ।
राजू कुमार ने शिव शंकर है जगदाधर प्रस्तुत किया ।
वल्लरी नारायण पाठक ने ध्रुपद शंकर अति प्रचंड प्रस्तुत किया।
एएडीसी से अनुज मिश्र ने शिष्यो के साथ गुरू वंदना , पंचम सवारी , तीन ताल मे निबद्ध रचनाओ की प्रस्तुती दी। भातखंडे के गुरू कमलेश दुबे ने ध्रुपद की प्रस्तुती दी ।संस्था की अध्यक्ष उमा त्रिगुणायत ने बताया की अल्पिका संस्था के द्वारा महाराज जी के नेतृत्व रहने के बाद से लगातार ड्योढी पर देश विदेश के शिष्य शिष्यायो के साथ मिलकर बसंतोत्सव का अयोजन आयोजित करते है क्योकि महाराज जी का जन्मो बसंतोत्सव के दिन पर हुआ था ।यह परम्परा उनके समय से ही चली आ रही है। जो उनके शिष्य/शिष्याये अपने अपने स्थान पर रहकर कथक से प्रणाम करते है।









