WhatsApp Image 2026 05 12 at 23.02.14

लखनऊ उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया है वह केवल एक प्रशासनिक निर्णय का मामला नहीं बल्कि शासन, तकनीक और जवाबदेही तीनों की विश्वसनीयता की कठोर परीक्षा है। ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा द्वारा यह घोषणा कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर व्यवस्था समाप्त कर अब इन्हें पोस्टपेड की तरह संचालित किया जाएगा पहली नजर में राहत का संकेत देती है। लेकिन क्या यह निर्णय वास्तव में उस गहरी समस्या का समाधान ह, जिसने लाखों उपभोक्ताओं को आर्थिक और मानसिक संकट में डाल दिया है
सवाल यहीं से शुरू होता हैऔर यहीं से सरकार की मंशा और सिस्टम की सच्चाई पर परत दर परत सवाल खड़े होते हैं।
प्रदेश के 77 लाख से अधिक घरों में लगाए गए स्मार्ट मीटरों को कभी पारदर्शिता, सटीकता और डिजिटल सुधार का प्रतीक बताया गया था।

लेकिन हकीकत इसके उलट सामने आई। उपभोक्ताओं ने 80 से 85 प्रतिशत तक बढ़े हुए बिजली बिलों की शिकायत की, भुगतान के बाद भी कनेक्शन बहाल न होने की घटनाएं सामने आईं, और तकनीकी खामियों ने इस पूरी योजना को अविश्वास के दलदल में धकेल दिया। यह कोई अपवाद नहीं बल्कि व्यापक स्तर पर फैली समस्या है जिसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या यह योजना बिना पर्याप्त परीक्षण और तैयारी के जनता पर थोप दी गई

अब जब प्रीपेड सिस्टम को समाप्त करने का निर्णय लिया गया है तो यह मान लेना कि समस्या खत्म हो जाएगी एक खतरनाक सरलीकरण है। क्योंकि मूल समस्या भुगतान प्रणाली में नहीं बल्कि उन मीटरों में है जो कथित रूप से तेज भाग रहे हैं गलत रीडिंग दे रहे हैं और उपभोक्ताओं की जेब पर असामान्य बोझ डाल रहे हैं। यदि वही मीटर अब पोस्टपेड मोड में भी चलते रहे तो क्या यह सुनिश्चित है कि बिलिंग में गड़बड़ी नहीं होगी क्या उपभोक्ता को मिलने वाली राहत वास्तविक होगी या केवल एक प्रशासनिक भ्रम

यहां सबसे बड़ी चुप्पी उस मुद्दे पर है, जो इस पूरे विवाद का केंद्र है मीटरों की गुणवत्ता और उनकी निष्पक्ष जांच। जिन मीटरों पर अधिक बिलिंग तकनीकी गड़बड़ी और यहां तक कि निम्न गुणवत्ता वाले कंपोनेंट्स के आरोप लगे हैं उन पर अब तक कोई व्यापक पारदर्शी और स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई गई क्या सरकार यह स्पष्ट करेगी कि इन मीटरों की थर्ड-पार्टी ऑडिट कब होगी क्या यह बताया जाएगा कि जिन उपभोक्ताओं से गलत बिलिंग के जरिए अधिक पैसा वसूला गया उसकी भरपाई कैसे होगी

तकनीकी स्तर पर भी यह योजना कई सवालों के घेरे में है। एक ही सिस्टम में कई डेटा मैनेजमेंट प्लेटफॉर्म (MDM) और हेड एंड सिस्टम (HES) का जटिल नेटवर्क जो समन्वय की कमी के कारण भुगतान के बाद भी कनेक्शन बहाल नहीं कर पाता यह किसी आधुनिक व्यवस्था की नहीं बल्कि अव्यवस्था की पहचान है। जब तकनीक उपभोक्ता को सुविधा देने के बजाय उसे भ्रम और परेशानी में डाल दे, तो वह “स्मार्ट” नहीं, बल्कि “सिस्टमेटिक फेल्योर” कहलाती है।

ऊर्जा मंत्री का “उपभोक्ता देवो भव” का संदेश सुनने में भले ही सशक्त लगे, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि उपभोक्ता आज भी असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहा है। भरोसा केवल बयान से नहीं बल्कि ठोस कार्रवाई से लौटता है और वह कार्रवाई अभी तक दिखाई नहीं देती।

और इस पूरे प्रकरण का सबसे असहज सत्य यह है कि यदि जनता और मीडिया ने समय रहते इस मुद्दे को प्रमुखता से नहीं उठाया होता, तो शायद यह निर्णय भी नहीं लिया जाता। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि
अगर जनता और मीडिया ने अपनी आवाज बुलंद न की होती तो ए.के. शर्मा प्रदेश की भोली-भाली जनता को “पप्पू” बना देते।

यह वाक्य केवल आलोचना नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर करारा प्रहार है जो जवाबदेही से बचने की कोशिश करती रही।

आज जरूरत केवल प्रीपेड से पोस्टपेड में बदलाव की नहीं बल्कि पूरे स्मार्ट मीटर सिस्टम की सर्जिकल ऑडिट तकनीकी शुद्धता की पुष्टि और जिम्मेदारी तय करने की है। जब तक यह नहीं होता तब तक यह पूरी योजना सुधार नहीं, बल्कि भ्रम का नया रूप ही मानी जाएगी।

अंततः प्रश्न सीधा है—
क्या सरकार समस्या की जड़ तक जाएगी या केवल सतही समाधान देकर जनता को फिर एक नए प्रयोग का हिस्सा बनाएगी

AUTHOR-HARENDRA SINGH

GUEST AUTHOR

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *