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लखनऊ इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने बाराबंकी शिक्षा विभाग में जारी ‘भ्रष्टाचार के खेल’ पर कड़ा प्रहार किया है। प्रबंधक सरदार आलोक सिंह की याचिका पर ऐतिहासिक सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजीव सिंह ने जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) ओ.पी. त्रिपाठी को तत्काल पद से हटाने और उनके खिलाफ एसटीएफ (STF) जाँच के आदेश दिए हैं।
क्या है पूरा मामला मामला सिटी इंटरमीडिएट कॉलेज, बाराबंकी का है। कॉलेज के एक सहायक अध्यापक (संस्कृत) अभय कुमार पर आरोप है कि उन्होंने प्रबंध समिति को बिना बताए छत्तीसगढ़ के बीजापुर स्थित एकलव्य विद्यालय में प्रवक्ता का पद संभाल लिया। हद तो तब हो गई जब वे वहां से विधिवत कार्यमुक्त हुए बिना ही बाराबंकी लौटे और DIOS व प्रधानाचार्य की मिलीभगत से दोबारा ज्वाइनिंग कर ली।
​न्यायालय में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता आकाश दीक्षित ने दलील दी कि शिक्षक अभी छत्तीसगढ़ में तैनात ही थे, तभी बाराबंकी के DIOS कार्यालय ने उन्हें अक्टूबर 2025 का वेतन भी जारी कर दिया।
​हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: “यह गंभीर प्रशासनिक अपराध है” सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि शिक्षक 14 नवंबर 2025 को छत्तीसगढ़ से कार्यमुक्त हुए, लेकिन उनका वेतन अक्टूबर में ही बाराबंकी से निकाल लिया गया, तो न्यायालय का पारा चढ़ गया। कोर्ट ने इसे केवल लापरवाही नहीं, बल्कि रिकॉर्ड में हेरफेर और जालसाजी माना।
​न्यायालय के कड़े निर्देश: DIOS का तत्काल तबादला: माध्यमिक शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को निर्देश दिया गया है कि ओ.पी. त्रिपाठी को तुरंत बाराबंकी से स्थानांतरित किया जाए।
​STF करेगी दूध का दूध, पानी का पानी: कोर्ट ने STF महानिदेशक को मामले की कमान सौंपी है। जाँच अधिकारी कम से कम DSP रैंक का होगा, जो DIOS, प्रधानाचार्य डॉ. शिव चरण गौतम और शिक्षक अभय कुमार की भूमिका की पड़ताल करेगा।
​वेतन की वसूली: शिक्षक अभय कुमार की पुनर्नियुक्ति को अवैध (Non-est) घोषित कर दिया गया है। उनके द्वारा लिए गए वेतन की वसूली संबंधित अधिकारियों की जेब से की जाएगी।
​अनुशासनात्मक कार्रवाई: संयुक्त शिक्षा निदेशक, अयोध्या मंडल के विरुद्ध भी विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं।
​अपराधिक मुकदमा दर्ज करने की छूट न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि STF जाँच में भ्रष्टाचार या जालसाजी के सबूत मिलते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज कर आपराधिक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। साथ ही, झूठा हलफनामा (Affidavit) देने के मामले में भी कोर्ट ने DIOS को आड़े हाथों लिया है।
​”प्रशासनिक पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। अधिकारियों का यह रवैया शिक्षा व्यवस्था को खोखला कर रहा है।” > — माननीय न्यायमूर्ति राजीव सिंह (सुनवाई के दौरान)
निष्कर्ष: बाराबंकी से लेकर लखनऊ के शिक्षा गलियारों में इस फैसले के बाद हड़कंप मचा हुआ है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि तकनीक के दौर में अब व्हाट्सएप और ईमेल के जरिए आदेशों की तामील होगी ताकि ‘फाइलों को दबाने’ का खेल खत्म किया जा सके।

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