लखनऊ12 जुलाई परिवारिक व सामाजिक संबंधो का वर्तमान स्वरूप पर आयोजित संगोष्ठी का आयोजन अवध फाउण्डेशन संस्था के प्रांगण मे हुआ।
मुख्य अतिथी राम कथा वाचक धीरेन्द्र वशिष्ठ का स्वागत करते हुए संस्था के अध्यक्ष सूरजदेव शुक्ल ने कहा की वर्तमान परिवेश मे सतयुग से कलयुग तक पारिवारिक संबंधो का जो पतन हो रहा है उसे कैसे सुधारा जाये । सभी के लिए यह एक विचारणीय प्रश्न है । जिसके लिए संस्था समय समय पर सामाजिक, साहित्यिक आयोजन करती है । आज की संगोष्ठी भी ऐसे ही कार्यो के अनुपालन के लिए है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन करने के पश्चात भारत रत्न बीना मिश्रा के शिष्यो अराध्या मिश्रा, अद्वैत मिश्रा, साक्षी मिश्रा, रचित मिश्रा द्वारा के श्रीराम स्तुति व हनुमान चालीसा के पाठ से हुआ l
रामप्रकाश त्रिपाठी के संचालन मे डाॅ काशीनाथ पांडेय ने कहा परिवार के बिना शिक्षा ज्ञान विकास किसी बच्चे का नही हो सकता ।प्राचीन भारतीय संस्कृति सभी अपने कर्तव्य बताती थी लेकिन प्रदुषित पाश्चात्य संस्कृति अधिकार सीखा रही है जो पतन का कारण है।
बीना मिश्रा ने रामायण के चरित्रो को काव्य मे ढालकर परिवार का महत्व बताया ।
बीरेन्द्र श्रीवास्तव ने समाज और देश की ईकाई परिवार को बताया।
मुख्य अतिथि एवं प्रमुख वक्ता के रूप में श्री लक्ष्मणपुरी पीठाधीश्वर महाराज श्री धीरेन्द्र वशिष्ठ “पारिवारिक व सामाजिक संबंधों का वर्तमान स्वरूप” विषय पर बोलते हुए कहा कि समाज मनुष्य को भ्रष्ट करता है मनुष्य अबोध बालक के रूप मे जनम लेता है । जो स्वभाव से सरल और सीधा होता है। समाज में आने के बाद संपत्ति लालच और ऊंच-नीच की भावना उसका स्वभाव परिवर्तित करके भ्रष्ट बना देती है।
मनुष्य स्वतंत्र पैदा होता है लेकिन हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है।
शास्त्र भी कहता है कि धर्म न दूजा सत्य समाना आगम निगम वेद बखाना
यह संगोष्ठी वर्तमान समय में बदलते पारिवारिक एवं सामाजिक मूल्यों पारस्परिक संबंधों संस्कारों तथा सामाजिक समरसता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित थी कार्यक्रम में शिक्षाविद् समाजसेवी बुद्धिजीवी युवा एवं विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य नागरिक श्रीमान काशी नाथ पाण्डेय आर डी शुक्ला शिवकुमार पांडेय,छठ कुमार शुक्ला आर सी त्रिपाठी जानकी शरण शुक्ला प्रणव दत्ता प्रकाश चन्द्र शर्मा राकेश तिवारी केसर सिंह श्रीमती बीना मिश्रा राम दयाल शुक्ला शिवकुमार पांडेय जानकी शरण शुक्ला टी एन शुक्ला लक्ष्मी नारायण दीक्षित ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
पारिवारिक व समाजिक संबंधो पर संगोष्ठी संपन्न
















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